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“अस्पताल या कत्लगाह? बस्ती में दलालों के मकड़जाल में दम तोड़ती व्यवस्था!” “स्वास्थ्य विभाग की ‘लीपापोती’, और मौत की गोद में सोता बस्ती का गरीब!”

"सरकारी अस्पताल से फर्जी क्लीनिक तक, दलालों के आगे नतमस्तक सिस्टम!" "जब सफेद कोट पर दाग और दलालों का राज हो, तो इलाज किसे कहें?"

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। अस्पताल या ‘कत्लगाह’? सफ़ेद कोट के पीछे दलालों का काला खेल ।।

उत्तर प्रदेश।

बस्ती।। कहने को तो अस्पताल ‘धरती के भगवान’ का मंदिर होता है, लेकिन आज की कड़वी हकीकत यह है कि सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों की चौखटों पर दलालों का ऐसा ‘मकड़जाल’ बुन दिया गया है, जहाँ मरीज बाद में पहुँचता है, माफिया पहले उसे घेर लेते हैं। भानपुर और विक्रमजोत CHC में हुई ताज़ा मौतों ने यह साबित कर दिया है कि विभाग की आँखों पर पट्टी बंधी है और सिस्टम गहरी नींद में सोया है।

💫जिम्मेदार कौन: विभाग या दलालों की साठगांठ?

हैरानी की बात यह है कि जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल हर दिन खुल रही है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ ‘खानापूर्ति’ और ‘समझौता’ हो रहा है। जब भी किसी लापरवाही से मरीज की जान जाती है, तो उसे ‘ठंडे बस्ते’ में डाल दिया जाता है।

जुगाड़ से चल रहे अस्पताल: शहर की गली-मोहल्लों में एक-दो कमरों के नाम पर अस्पताल खुले हैं, जहाँ न वेंटिलेटर है, न विशेषज्ञ। वहाँ है तो बस दलालों का नेटवर्क जो भोले-भाले ग्रामीणों को ‘बेहतर इलाज’ का लालच देकर मौत के मुँह में धकेल देता है।

CHC की बदहाली: सरकारी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) का हाल और भी बुरा है। भानपुर में जहाँ एक अदद विशेषज्ञ के अभाव में बुजुर्ग की जान चली गई, वहीं विक्रमजोत में प्रसूता की मौत सिस्टम पर कलंक है। क्या हमारे स्वास्थ्य केंद्र सिर्फ ‘रेफर सेंटर’ बनकर रह गए हैं?

💫पैसे की हवस और मरती इंसानियत

खबरों की मानें तो कटरा स्थित एक नर्सिंग होम में तो बिना सहमति के बच्चेदानी निकालने जैसा संगीन जुर्म तक हो गया। क्या प्रशासन इतना लाचार है कि अस्पताल बंद होने के बाद फिर नए नाम से उसी जगह खुल जाते हैं? अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में डॉक्टरों के फर्जी हस्ताक्षर और बिना डिग्री के क्लीनिक चलाना अब यहाँ आम बात हो गई है।

एक बड़ा सवाल: सीडीओ (CDO) द्वारा संविदा समाप्त करने के निर्देश के बाद भी सीएमओ (CMO) आखिर किस जांच रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं? क्या विभाग को और मौतों का इंतजार है?

💫अब चुप रहना भी अपराध है

बस्ती की जनता कब तक इन ‘मौत के सौदागरों’ की शिकार बनती रहेगी? जब तक स्वास्थ्य विभाग इन माफियाओं और दलालों के खिलाफ कड़ा एक्शन नहीं लेता, तब तक गरीब की जान यूँ ही सड़कों पर या इन फर्जी अस्पतालों के बिस्तरों पर दम तोड़ती रहेगी। विभाग को अब ‘समझौते’ की राजनीति छोड़कर ‘सफाई’ की नीति अपनानी होगी।

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